Saturday, March 18, 2017

Rajasir

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Tuesday, July 21, 2015

प्रेरणा कथा: बुरा समय हमेशा नहीं रहता Prerna Katha: Bura Samaye Hamesha Nahi Rehta

प्रेरणा कथा: बुरा समय हमेशा नहीं रहता

 यह सिर्फ किसी राजा की कहानी नहीं है यह हम सब की कहानी है ! हम सभी परिस्थिति, काम, तनाव के दवाव में इतने जकड जाते हैं कि हमे कुछ सूझता नहीं है , हमारा डर हम पर हावी होने लगता है, कोई रास्ता, समाधान दूर दूर तक नजर नहीं आता, लगने लगता है कि बस, अब सब ख़तम ,है ना?

जब ऐसा हो तो २ मिनट शांति से बेठिये, थोड़ी गहरी गहरी साँसे लीजिये ! अपने आराध्य को याद कीजिये और स्वयं से जोर से कहिये --यह भी कट जाएगा ! आप देखिएगा एकदम से जादू सा महसूस होगा , और आप उस परिस्थिति से उबरने की शक्ति अपने अन्दर महसूस करेंगे ! आजमाया हुआ है ! बहुत कारगर है !

 पूरी कथा नीचे के विडीयो में देखें!

प्रेरणा कथा: बुरा समय हमेशा नहीं रहता Prerna Katha: Bura Samaye Hamesha ...

Monday, July 20, 2015

औंन लाइन पैसे कमाने के तरीके: १ क्युमी. कौम

औंन लाइन पैसे कमाने के तरीके: १ क्युमी. कौम Qmee.com

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बुल्ले शाह अब हीर ना कहे: Bulle Shah Ab Heer Na Kahe

बुल्ले शाह अब हीर ना कहे

बुल्ले शाह अब हीर ना कहे

कौपीराइट@२०१५ राजा शर्मा

कैसे रोऊँ अब आँखों से के मेरी अब नीर ना बहे
कैसी बन गयी दुनिया रे के बुल्ला अब हीर ना कहे

बंदा रूप के गुमान में खोया
प्यार पैसे वाली छाओं में सोया
टूटी जाती है मोहब्बतों की माला
मोती इक इक आँसुओं से धोया
इस दुनिया में है कोई ऐसा के जो मेरी वाली पीर ना सहे
कैसी बन गयी दुनिया रे के बुल्ला अब हीर ना कहे

धर्म दिलों को चलाना चाहे
कई बेटे और बेटियों को खाये
कैसा नीच हो गया है जमाना
कांटों भरी हैं प्रेम की राहें
कोई इनको बता दो जाकर के प्रेमी साधु पीर ना कहे
कैसी बन गयी दुनिया रे के बुल्ला अब हीर ना कहे

जात पात के बहुत हैं बहाने
लोग खुद को लगे हैं सजाने
बस गैरों को है नीचे गिराना
लगे नारे आज गूंगे लगाने
ऐसी गंदी आज हुई है सियासत के देखो वीर वीर ना रहे
कैसी बन गयी दुनिया रे के बुल्ला अब हीर ना कहे

जे. कृष्णमूर्ति कहते हैं 4: इच्छाओं का ना होना (J. Krishnamurti)

जे. कृष्णमूर्ति  कहते हैं 4: इच्छाओं का ना होना  (J. Krishnamurti)

(Translated from English to Hindi by Raja Sharma)

जब एक शिक्षक इच्छाविहीन होना चाहता है तो उसको बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और छात्र के द्रष्टिकोण से भी इसमे विशेष ध्यान देने की अवश्यकता होती है।

जैसा की "गुरु के कदमो में" नामक किताब में कहा गया है, "भगवान की पवित्र उपस्थिति के प्रकाश में सब इच्छाएं मर जाती हैं सिवाय प्रभु जैसा होने की इच्छा के।"

भगवद गीता में भी कहा गया है कि परमात्मा के दर्शन हो जाने पर सब इच्छाएं मर जाती हैं।

यही आदर्श लक्ष होना चाहिये कि एक इच्छा सभी परिवर्तित हो रही इच्छाओं का स्थान ले ले। यह परम इच्छा हमारे धर्म में दिखती है, और एक शिक्षक, जिसका धर्म अध्यापन है, लक्ष करे कि उसकी एक मात्र इच्छा पढ़ाने की हो और अच्छे से पढ़ाने की हो।

वास्तव में जब तक एक शिक्षक ये पढ़ाने की इच्छा नहीं महसूस करता शिक्षा उसका धर्म नहीं होता, क्योंकि ये इच्छा पढ़ाने की क्षमता से जुड़ी होती है।

हमनें पहले ही कहा कि दुर्भाग्यवश शिक्षक के पद के साथ कम सम्मान जुड़ा होता है, और एक व्यक्ति शिक्षक का पद प्रायः इसलिये स्वीकार करता है क्योंकि वो और कोई पद प्राप्त नहीं कर सकता। वो पढ़ाना शुरू करता है इसलिये नहीं कि पढ़ाने की उसकी इच्छा होती है बल्कि इस लिये की वो जानता है कि वो पढ़ा सकता है।

परिणाम ये होता है कि ऐसा शिक्षक और किसी वस्तु से ज्यादा अपनी तनख्वाह के बारे में सोचता है, और हमेशा ही और अधिक तनख्वाह वाले पद की खोज में रहता है। यही उसकी मुख्य इच्छा बन जाती है।

एक तरफ थोड़ा सा दोष तो शिक्षक को दिया ही जाता है, परंतु अधिकांशतः प्रणाली ही गलत होती है, क्योंकि शिक्षक को इतना तो चाहिये ही होता है कि अपने परिवार का पालन पोषन कर सके, और ये इच्छा उसमे होना सही और स्वभाविक भी है।

ये राष्ट्र का कर्तव्य होता है कि शिक्षक को किसी भी ऐसे पद पर ना आसीन किया जाये जहां वो हमेशा ही और ज्यादा तनख्वाह की कामना करता रहे, या और ज्यादा कमाने के लिये निजी शिक्षण, या प्राइवेट ट्यूशन लेना शुरू कर दे।

जब इस बात का ध्यान रखा जायेगा तभी शिक्षक संतुष्ट और प्रसन्न महसूस करेगा अपने पद पर काम करते हुए, और शिक्षक के धर्म की गरिमा को महसूस करेगा, चाहे उसका पद कैसा भी हो, हालांकि आजकल तनख्वाह के आधार अधिकतर पद छोटे या बड़े होते हैं।

मात्र वो व्यक्ति जो वास्तव में संतुष्ट और प्रसन्न है अच्छे से पढ़ाने के लिये स्वतंत्र मस्तिष्क का स्वामी हो सकता है।

शिक्षक को अपने लिये छात्रों को बाध्य करके श्रेय लेने की इच्छा नहीं होनी चाहिये, परंतु उसे प्रत्येक छात्र की विशेष प्रतिभा का ध्यान रखना चाहिये, और उस मार्ग का ध्यान रखना चाहिये जिसपर चल कर वो छात्र अधिकतम सफलता प्राप्त कर सकता है।

प्रायः ऐसा होता है कि एक शिक्षक मात्र अपने विषय के बारे में सोचते हुए ये भूल जाता है कि छात्र को और भी बहुत से विषय पढ़ने हैं। उसी विषय पर अधिक जोर देना चाहिये जिस विषय के लिये छात्र की क्षमता उपयुक्त हो।

जब तक शिक्षक एक दूसरे से सहयोग नहीं करते, छात्र पर बहुत अधिक दबाव होता है, क्योंकि प्रत्येक शिक्षक अपने विषय पर ज्यादा जोर देता है, और अपने ही विषय का ग्रह कार्य भी देता है। शिक्षक तो बहुत होते हैं, पर छात्र तो अकेला ही होता है।

परीक्षा में उत्कृष्ट परिणाम पाने के लिये शिक्षक को अपनी इच्छा से पहले छात्र के हित को आगे रखना चाहिये।

कभी कभी छात्र को अपने हित के लिये किसी विषय को पूर्ण रूप से समझने के लिये एक ही कक्षा में एक वर्ष और लगा देना चाहिये ना कि उस परीक्षा में बैठना चाहिये जो उसके लिये बहुत ही कठिन हो। ऐसी अवस्था में छात्र को एक वर्ष और उसी कक्षा में रोक देना चाहिये।
परंतु मात्र शिक्षक के लिये अच्छे परिणाम लाने के लिये छात्र को नहीं रोकना चाहिये।

दूसरी तरफ, शिक्षक को कभी कभी उन अभिभावकों का भी विरोध करना पड़ता है जो छात्र को उसकी क्षमता से ज्यादा करने के लिये बाध्य करते हैं, और उसको उपर की कक्षा में पहुंचाना चाहते हैं।

जबतक शिक्षक में इच्छा शून्यता नहीं होगी उसकी अपनी इच्छायें उसको अंधा बना देंगी और वो छात्रों को उनकी क्षमता से ज्यादा करने के लिये बाध्य करेगा। वो छात्रों पर अपनी इच्छायें लादेगा ना कि उनको स्वभाविक विकास करने देगा।

जे. कृष्णमूर्ति कहते हैं 3: विवेक (J. Krishnamurti)

जे. कृष्णमूर्ति  कहते हैं 3: विवेक  (J. Krishnamurti)

(Translated from English to Hindi by Raja Sharma)

शिक्षक की अगली आवश्यक योग्यता विवेक होती है। मेरे गुरु ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान मनुष्य के लिये भगवान की योजना का होता है, क्योंकि भगवान की एक योजना है, और वो योजना है क्रमिक विकास।

क्रमिक विकास में हर छात्र का अपना स्थान होता है, और शिक्षक को ये ध्यान देना चाहिये कि वो स्थान क्या है, और शिक्षक उस स्थान पर छात्र को कैसे सर्वश्रेष्ठ सहयोग कर सकता है।

इसको ही हिन्दू धर्म को मानने वाले धर्म कहते हैं, और ये शिक्षक का कर्तव्य होता है कि वो छात्र के धर्म को पहचाने और इसकी पूर्ति में छात्र को सहयोग करे।

दूसरे शब्दों में, छात्र को वही शिक्षा देनी चाहिये जो उसके लिये योग्य हो, और शिक्षक को इस शिक्षा को छानने में उसे अपने छात्र को देने में अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिये।

इन अवस्थाओं के अंतर्गत, छात्र की प्रगति उसके पूर्व जन्मों की धारणाओं का अनुसरण करते हुए होती है, और वो छात्र उन सब चीजों को सच में याद करेगा जो उसको पहले से आती थी।

महान गुरु ने कहा, "क्रमिक विकास का तरीका पुनर्व्यवस्था अंतर्गत लगातार डूबना है और ये पुनर्जनम और कर्म से होता है।"

जबतक शिक्षक को ये जानकारी नहीं होती, वो क्रमिक विकास में वैसे काम नहीं कर सकता जैसे करना चाहिये, और उसका और उसके शिष्यों का बहुत समय व्यर्थ होगा।

विषयों को छानने की प्रक्रिया में और उनको कैसे पढ़ाना  है में विवेक की अवश्यकता होती है। महत्व के अनुसार, सबसे पहले धर्म और नैतिक मूल्य आते हैं, और इनको विषय के रूप में नहीं पढ़ाना चाहिये परंतु इनको विद्यालय के जीवन की आधारशिला और वातावरण बनाना चाहिये, क्योंकि इनकी अवश्यकता हर छात्र को होती है चाहे उसने बाद के जीवन में जो कुछ भी करना हो।

धर्म हमको सिखाता है कि हम सब एक आत्म के अंग हैं, और इसीलिये हमें एक दूसरे को सहयोग करना चाहिये।

मेरे गुरु कहते थे कि लोग अपने लिये वही रास्ते खोजने का प्रयास करते हैं जो उनके विचार में उनके लिये सुखद होते हैं, पर वो ये नहीं समझते कि सभी लोग एक ही हैं, और इसीलिये जो भगवान की इच्छा होती है वही सबके लिये सुखद होता है।

और गुरु ये भी कहते थे कि आप अपने भाई को सहयोग उन चीजों के द्वारा कर सकते हैं जो आप दोनो में सामान्य हों, और वही दैविक जीवन होता है। ये पढ़ाना ही धर्म पढ़ाना है, और इसके अनुसार जीना ही धार्मिक जीवन जीना है।

वर्तमान में विद्यालयों के अपने प्रबन्धों के कारण स्थायी नैतिक शिक्षा विस्तृत रूप में व्यर्थ हो गयी है।

विद्यालय का दिन धार्मिक सेवा के स्वभाव से शुरू होना चाहिये, सामान्य उद्देश्य और सामान्य जीवन के बारे में बताते हुए, ताकि सभी छात्र जो अलग अलग घरों से और अलग अलग जीवन शैलियों से आते हैं विद्यालय में एकता के सूत्र में बांध सकें।

ये एक अच्छी योजना होगी यदि विद्यालय के दिन का प्रारंभ थोड़े संगीत और गायन से शुरू हो ताकि सभी छात्र जो जल्दी जल्दी घर से खाना खाकर विद्यालय को भागते हैं थोड़ा शांत हो जायें और विद्यालय का दिन एक व्यवस्थित ढंग से शुरू कर सकें।

इसके बाद एक प्रार्थना होनी चाहिये और एक छोटा पर सुन्दर व्यक्तव्य जो छात्रों के सामने आदर्श प्रस्तुत कर सके।

पर यदि इन आदर्शों को उपयोगी बनाना है तो ये आदर्श दिन भर विद्यालय में अभ्यास करने चाहिये ताकि धर्म की आत्मा सभी अध्यायों और खेलों में समावेशित रहे।

उदाहरण के लिये शक्तिशाली ने कमजोर को सहयोग करना चाहिये धार्मिक घंटे में सिखाते हैं, और फिर भी दिन भर शक्तिशाली छात्र कमजोर छात्रों को पीछे छोड़ने में लगे रहते हैं, और सफल छात्रों को उनकी सफलता के लिये पुरस्कार भी दिये जाते हैं।

ये पुरस्कार कतिपय छात्रों को ईष्यालु बना सकते हैं और कई छात्रों को हतोत्साहित कर सकते हैं। इन पुरस्कारों से संघर्ष का मनोबल उत्तेजित होता है। सेंट्रल हिन्दू कौलेज ब्रदरहुड का सिद्धांत है, "प्रेम और सेवा को और शक्ति प्रदान करना ही आदर्श पुरस्कार होता है।"

यदि ये पुरस्कार अच्छे कामों, औरों को सहयोग करने के लिये, और अच्छे व्यवहार के लिये दिये जायें तो बहुत अच्छा है, प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करने के लिये ना दिये जायें।

वास्तव में विद्यालय में चरित्र और सहयोग को सम्मान दिया जाना चाहिये ना कि दिमाग और शरीर की शक्ति को; शक्तिशाली बनाने की तालीम देनी चाहिये और शक्ति का विकास करना चाहिये, परंतु कमजोर को पराजित करने के लिये पुरस्कृत नहीं करना चाहिये।

विद्यालय के ऐसे जीवन के द्वारा विश्व में ऐसे मनुष्य जायेंगे जो राष्ट्र के लिये उपयोगी स्थानों में काम करेंगे नाकि सिर्फ अपने लिये पैसे और शक्ति संकलन करेंगे।

देशभक्ति और राष्ट्रा प्रेम नैतिक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग होता है। विद्यालय में छोटे से परिवार की सेवा का भाव सीखने के बाद वो छात्र बड़ा होकर स्वभाविक रूप में राष्ट्र के बड़े परिवार की सेवा करने लगेगा।

देशभक्ति का पाठ बहुत सावधानी से पढ़ाना चाहिये ताकि छात्र और राष्ट्रों से घृणा ना करने लगे जैसा कि प्रायः होता ही है।

पढ़ने वाले अध्यायों के प्रबंधन करते समय विवेक की अवश्यकता होती है। जहां तक संभव हो सबसे कठिन विषय दिन के प्रारम्भिक घंटों में ही पढ़ाये जायें। चाहे जितनी भी व्यवस्थित ढंग से अध्यापन की शैली तैयार की गयी हो, छात्र दिन की शुरुवात की तुलना में दिन के अंत के घंटों में बहुत थक जाते हैं।

पढ़ाने के तरीकों, और मानसिक और शारीरिक शिक्षा के लिये भी विवेक की अवश्यकता होती है। शरीर का ध्यान और इसका विकास सबसे महत्वपूर्ण होता है क्योंकि स्वस्थ शरीर के बिना सब शिक्षा व्यर्थ होती है।

ये ध्यान रखना चाहिये कि एक छात्र सारा जीवन ही सीख सकता है यदि वो इतना बुद्धिमान है और वो ऐसा करना चाहता है, परंतु उसके विकास के शुरू के ही कुछ वर्षों में वो अपने शरीर का विकास कर सकता है और स्वस्थ शरीर के साथ अपना जीवन बिता सकता है।

छात्रों के दिमाग, और विशेष कर बहुत छोटे छात्रों के दिमाग पर तनाव बहुत अधिक होता है और बहुत लम्बे समय तक चलता है; इसीलिये अध्याय योजना छोटे छोटे खण्डों में होनी चाहिये, और शिक्षक को ये ध्यान रखना चाहिये की छात्र थक ना जायें।

इस तनाव को छात्रों से दूर रखने के लिये एक विवेकशील शिक्षक पढ़ाने के नये तरीके खोजेगा, जिनके द्वारा पढ़ाये जा रहे अध्याय मनोरंजक हो जायें, क्योंकि जो छात्र अध्याय में रुचि रखता है जल्दी थकता नहीं है।

मुझे स्वयं भी याद है की विद्यालय से घर आने के बाद हम कितने थके हुए होते थे, सिर्फ बिस्तर पर लेट जाने के सिवाय कुछ ना करने योग्य।

लेकिन भारत में छात्र को घर वापिस आ जाने के बाद भी आराम करने की अनुमती नहीं होती है क्योंकि उसको ग्रह कार्य करना पड़ता है, प्रायः एक शिक्षक के सहयोग के साथ, जबकि या तो उसे खेलना चाहिये या आराम करना चाहिये।

घर में पढ़ने वाले अध्याय दूसरी सुबह फिर शुरू हो जाते हैं उसके विद्यालय जाने से पहले, और इसके परिणामस्वरूप वो अपने अध्यायों को आनंद के साथ ना पढ़कर एक कठिन काम मानना शुरू कर देता है।

भारतीय घरों में छात्र अधिकांश ग्रह कार्य मंद प्रकाश में करते हैं और इसके परिणामस्वरूप छात्र की आँखों पर बुरा असर होता है। सब प्रकार के ग्रह कार्य समाप्त कर दिये जाने चाहिये। ग्रह कार्य से छात्र को दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है और छात्र का जीवन एक गुलाम जैसा हो जाता है।

विद्यालय का समय भी बहुत लम्बा होता है, और एक विवेकी शिक्षक को जितना हो सके छात्रों को ज्ञान देते रहना चाहिये पर ये ध्यान रखते हुए कि उनकी रुचि कम ना हो। अगर वो पूरा अध्याय एक दिन में समाप्त नहीं कर सकता तो उसको दूसरे दिन जारी रखना चाहिये।

मैने तो सुना है की विलायत के गरीब विद्यालयों में भी प्रायः डाक्टर आकर छात्रों को जाँचते हैं ताकि उनको कोई आँखों का रोग ना लगे या और कोई शारीरिक कमी ना हो जाये।

शिक्षक और छात्र दोनो को ही स्वच्छ रहना चाहिये और स्वच्छ कपड़े पहनने चाहिये, और इसमें विवेक की अवश्यकता होती है।

शिक्षक ने कमजोर छात्रों पर चतुर छात्रों से अधिक ध्यान देना चाहिये।